भारत में मूर्तिकला और वास्तुकला का आरंभ कब से माना जाता है ?

भारत में मूर्तिकला और वास्तुकला का आरंभ कब से माना जाता है ?


भारत में मूर्तिकला और वास्तुकला की परंपरा अत्यंत प्राचीन मानी जाती है। भारतीय कला एवं स्थापत्य का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। इसके प्रारंभिक प्रमाण प्रागैतिहासिक काल से प्राप्त होते हैं, जबकि सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 2600–1900 ईसा पूर्व) में मूर्तिकला, भवन निर्माण और नगर नियोजन का विकसित एवं व्यवस्थित स्वरूप स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।


भारत में मूर्तिकला और वास्तुकला का आरंभ कब से माना जाता है ?

अन्य कलाओं की तरह भारतीय मूर्तिकला की परंपरा भी अत्यंत प्राचीन है। पाषाण काल में मानव अपने पत्थर के उपकरणों को काट-छाँटकर विभिन्न आकार देता था। पत्थर से फलक निकालने और उपकरणों को उपयोगी रूप देने के लिए दबाव तकनीक तथा प्रहार द्वारा तोड़ने जैसी तकनीकों का प्रयोग किया जाता था। हालांकि इन उपकरणों को आधुनिक अर्थों में मूर्तिकला नहीं कहा जा सकता, लेकिन इससे यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन मानव को पत्थर को आकार देने का पर्याप्त ज्ञान था।

भारत में मूर्तिकला का अधिक विकसित और स्पष्ट स्वरूप हड़प्पा या सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान दिखाई देता है। इस सभ्यता के विभिन्न पुरातात्विक स्थलों से प्राप्त मूर्तियाँ, टेराकोटा आकृतियाँ, पशु प्रतिमाएँ और मुहरें लगभग चार हजार वर्ष से अधिक पुरानी कला-परंपरा का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। मोहनजोदड़ो से प्राप्त प्रसिद्ध कांस्य नर्तकी की प्रतिमा प्राचीन भारतीय धातु-कला का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसी प्रकार पत्थर की मानव एवं पशु आकृतियाँ भी उस समय के कलाकारों की तकनीकी दक्षता को दर्शाती हैं।

भारत में मूर्तिकला का विकास

सिंधु घाटी सभ्यता के बाद भारतीय मूर्तिकला का विकास विभिन्न ऐतिहासिक कालों में निरंतर होता रहा। मौर्य काल (लगभग 322–185 ईसा पूर्व) में पत्थर पर उत्कृष्ट कार्य और विशाल पाषाण स्तंभों का निर्माण हुआ। सम्राट अशोक के स्तंभों पर उत्कीर्ण सिंह, बैल और अन्य आकृतियाँ भारतीय शिल्पकला की उच्च गुणवत्ता को दर्शाती हैं।

मौर्य काल के बाद शुंग, सातवाहन, कुषाण और अन्य कालों में भारतीय आकृतिमूलक मूर्तिकला का और अधिक विकास हुआ। इस दौरान बौद्ध, हिंदू और बाद में जैन धार्मिक परंपराओं से संबंधित मूर्तियों का निर्माण व्यापक रूप से होने लगा। मानव आकृतियों के माध्यम से धार्मिक विचारों, आध्यात्मिक अवधारणाओं और देवी-देवताओं के विभिन्न स्वरूपों को अभिव्यक्त किया गया।

भारतीय मूर्तिकला में मानव शरीर को केवल भौतिक रूप में नहीं, बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक प्रतीकों के रूप में भी प्रस्तुत किया गया। विशेष रूप से हिंदू मूर्तिकला में देवी-देवताओं के अनेक सिर और भुजाएँ उनकी विभिन्न शक्तियों, गुणों और स्वरूपों को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाती हैं।

भारत में वास्तुकला का आरंभ

भारत में वास्तुकला के प्रारंभिक व्यवस्थित प्रमाण भी सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त होते हैं। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा और लोथल जैसे नगरों में योजनाबद्ध सड़कें, मकान, कुएँ, जल निकासी प्रणाली तथा सार्वजनिक संरचनाएँ बनाई गई थीं।

मोहनजोदड़ो का प्रसिद्ध महान स्नानागार (Great Bath) प्राचीन भारतीय वास्तुकला और जल प्रबंधन का महत्वपूर्ण उदाहरण है। वहीं धोलावीरा में विकसित जल-संग्रहण प्रणाली और नगर नियोजन उस समय की उन्नत स्थापत्य एवं इंजीनियरिंग समझ को प्रदर्शित करते हैं।

इसके बाद मौर्य काल में स्तूप, स्तंभ, राजकीय भवन तथा शैल-कट वास्तुकला का विकास हुआ। आगे चलकर बौद्ध चैत्य-विहार, हिंदू मंदिर तथा जैन स्थापत्य ने भारतीय वास्तुकला को अलग-अलग क्षेत्रीय और धार्मिक शैलियों में विकसित किया।

भारतीय मूर्तिकला और वास्तुकला की विशेषता

भारतीय मूर्तिकला और वास्तुकला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि दोनों का विकास धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन के साथ गहराई से जुड़ा रहा। मंदिरों, स्तूपों और गुफाओं में वास्तुकला के साथ-साथ मूर्तिकला और अलंकरण का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।

समय के साथ भारत में मौर्य, शुंग, सातवाहन, कुषाण, गुप्त, पल्लव, चालुक्य, चोल, राष्ट्रकूट और विजयनगर जैसी विभिन्न राजवंशीय एवं क्षेत्रीय परंपराओं ने कला और स्थापत्य को समृद्ध किया। परिणामस्वरूप भारत में मंदिर वास्तुकला, शैल-कट गुफाओं, स्तूपों, स्तंभों तथा विभिन्न प्रकार की मूर्तिकला की अनेक विशिष्ट शैलियाँ विकसित हुईं।

भारतीय मूर्ति कला की प्रमुख शैलियाँ इस प्रकार हैं-

👉 सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तिकला

👉 मौर्यकालीन मूर्तिकला

👉 मौर्योत्तर कालीन मूर्तिकला

👉 गांधार कला की मूर्तियाँ

👉 मथुरा कला की मूर्तियाँ

👉 अमरावती की मूर्तिकला

👉 गुप्तकालीन मूर्तिकला

👉 वाकाटककालीन मूर्तिकला

👉 मध्यकालीन भारतीय मूर्तिकला

👉 चोलकालीन मूर्तिकला

👉 आधुनिक भारतीय मूर्तिकला

👉 भारतीय वास्तुकला एवं मूर्तिकला का संबंध


प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय वास्तुकला की एक अद्भुत विशेषता यह है कि मूर्तिकला और स्थापत्य कला एक-दूसरे के अभिन्न अंग रहे हैं। भारत के अनेक प्राचीन मंदिरों, स्तूपों, गुफाओं और अन्य स्थापत्य संरचनाओं में वास्तुशिल्प के साथ-साथ उत्कृष्ट मूर्तिकला और अलंकरण देखने को मिलता है।

इस संदर्भ में सिंधु घाटी सभ्यता की वास्तुकला कुछ अलग दिखाई देती है। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और अन्य नगरों में भवन निर्माण मुख्यतः उपयोगिता, नगर नियोजन, जल प्रबंधन और सुव्यवस्थित निर्माण पर केंद्रित था। इन संरचनाओं में बाद के भारतीय मंदिरों की तरह व्यापक सजावटी मूर्तिकला दिखाई नहीं देती। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि सिंधु घाटी सभ्यता में कलात्मक कौशल का अभाव था। इस सभ्यता से प्राप्त कांस्य नर्तकी, पत्थर की मानव एवं पशु आकृतियाँ, टेराकोटा मूर्तियाँ और कलात्मक मुहरें उस समय की विकसित कला-कौशल का प्रमाण हैं।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि सिंधु घाटी सभ्यता की वास्तुकला अपेक्षाकृत उपयोगितावादी थी, जबकि उसकी मूर्तिकला और शिल्पकला अन्य माध्यमों में विकसित हुई। बाद के कालों में भारतीय वास्तुकला और मूर्तिकला का संबंध और अधिक घनिष्ठ होता गया तथा मंदिरों, स्तूपों और गुफा स्थापत्य में दोनों कलाओं का अद्भुत समन्वय दिखाई देने लगा।


 सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तिकला


सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तिकला | प्रमुख मूर्तियाँ, मोहरें और कला



सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तिकला भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीन कला-परंपरा का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। लगभग 2600–1900 ईसा पूर्व के परिपक्व हड़प्पा काल में शिल्पकारों ने पत्थर, कांस्य, तांबा, मिट्टी और टेराकोटा जैसी विभिन्न सामग्रियों का प्रयोग करके मानव तथा पशु आकृतियों का निर्माण किया। इन कलाकृतियों से तत्कालीन समाज की कलात्मक क्षमता, तकनीकी ज्ञान और सांस्कृतिक जीवन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

पुरातात्विक साक्ष्यों से पता चलता है कि सिंधु घाटी सभ्यता का परिपक्व शहरी चरण अत्यंत विकसित था। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा और अन्य नगरों में योजनाबद्ध सड़कें, पक्की ईंटों से बने मकान, जल निकासी की सुव्यवस्थित व्यवस्था, सार्वजनिक भवन, भंडारण संरचनाएँ और विभिन्न प्रकार की कार्यशालाएँ मिली हैं। इन नगरों के वैज्ञानिक नियोजन और उन्नत निर्माण तकनीक से स्पष्ट होता है कि उस समय का समाज आर्थिक एवं तकनीकी दृष्टि से काफी विकसित था। ऐसे समृद्ध समाज में कला और शिल्प का विकसित होना स्वाभाविक था।

सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त मूर्तियों में मानव और पशु आकृतियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनमें से कुछ पत्थर की मूर्तियाँ अत्यंत उच्च स्तर की शिल्पकला को प्रदर्शित करती हैं। मोहनजोदड़ो से प्राप्त लगभग 7 इंच ऊँची एक दाढ़ी वाले पुरुष की सिर और कंधे तक की प्रतिमा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसके चेहरे पर छोटी दाढ़ी, बारीकी से बनाई गई मूंछें तथा शांत भाव दिखाई देते हैं। इसे आधुनिक साहित्य में प्रायः “पुरोहित-राजा” (Priest-King) कहा जाता है, हालांकि इसे वास्तव में राजा या पुरोहित मानने का कोई निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

इस प्रतिमा की शैली में चेहरे की प्रस्तुति और कुछ अन्य विशेषताओं के कारण पश्चिम एशिया, विशेषकर मेसोपोटामिया की कुछ प्राचीन कलाकृतियों से तुलना की गई है। इससे सिंधु घाटी सभ्यता और समकालीन पश्चिम एशियाई संस्कृतियों के बीच संभावित सांस्कृतिक एवं व्यापारिक संपर्कों की ओर संकेत मिलता है। हालांकि किसी प्रत्यक्ष सांस्कृतिक प्रभाव का निश्चित निष्कर्ष निकालना अभी भी कठिन है।


मौर्यकालीन मूर्तिकला


मौर्यकालीन मूर्तिकला की उत्कृष्ट कला एवं शिल्प-कौशल का अद्भुत उदाहरण।


हड़प्पा युग और मौर्य काल के बीच के लंबे अंतराल से संबंधित अनेक पुरातात्विक अवशेष आज हमारे सामने उपलब्ध नहीं हैं। इसका एक प्रमुख कारण यह माना जाता है कि उस समय भवनों और अन्य संरचनाओं के निर्माण में पत्थर की अपेक्षा लकड़ी, कच्ची ईंट और अन्य नष्ट होने वाली सामग्रियों का अधिक प्रयोग किया जाता था। इसके विपरीत, मौर्य काल में पत्थर के व्यापक प्रयोग और उस पर उत्कृष्ट पॉलिश की तकनीक के कारण इस युग के अनेक महत्वपूर्ण अवशेष आज भी सुरक्षित हैं। 

मौर्य शासन और विशेष रूप से पाटलिपुत्र की भव्यता का उल्लेख यूनानी राजदूत मेगास्थनीज ने अपनी पुस्तक इण्डिका में किया है। उसके विवरण के अनुसार पाटलिपुत्र एक विशाल और सुदृढ़ नगर था, जो मजबूत लकड़ी की प्राचीर से घिरा हुआ था। नगर में अनेक बुर्ज और प्रवेश द्वार थे तथा इसके भीतर राजमहल स्थित था। मेगास्थनीज ने राजमहल की भव्यता की तुलना फारसी शाही भवनों से की थी। पाटलिपुत्र की यह स्थापत्य परंपरा मौर्यकालीन शहरी विकास और राजकीय वैभव को दर्शाती है।

सम्राट अशोक के शासनकाल में मौर्य कला को विशेष प्रोत्साहन मिला। बौद्ध धर्म अपनाने के बाद अशोक ने स्तूपों, स्तंभों, शिलालेखों और धार्मिक स्मारकों के निर्माण को बढ़ावा दिया। उनके द्वारा स्थापित पत्थर के स्तंभ और उनके शीर्ष पर बनी सिंह, बैल तथा हाथी जैसी पशु आकृतियाँ मौर्यकालीन मूर्तिकला की उत्कृष्ट उपलब्धियाँ हैं। अशोक के समय पत्थर पर की गई चमकदार पॉलिश और शिल्प-कौशल ने भारतीय कला को एक नई दिशा प्रदान की।

एक महत्वपूर्ण तथ्य: फ़ाह्यान भारत लगभग 399–414 ईस्वी के बीच आया था, न कि 1400 ईस्वी के आसपास। उसने पाटलिपुत्र में अशोक के महल से संबंधित अवशेषों का उल्लेख किया था। इससे यह संकेत मिलता है कि मौर्यकालीन स्थापत्य की भव्यता सदियों बाद भी यात्रियों के लिए आकर्षण का विषय बनी हुई थी।


मौर्योत्तर कालीन मूर्तिकला

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारतीय कला और मूर्तिकला में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी-चौथी शताब्दी ईस्वी तक विभिन्न क्षेत्रों में शुंग, सातवाहन, शक, कुषाण आदि राजवंशों के संरक्षण में मूर्तिकला का तेजी से विकास हुआ। मौर्यकाल की राजकीय और भव्य कला के आगे बढ़ते हुए इस दौर में कलाकारों ने धार्मिक कथाओं, मानव आकृतियों, देवी-देवताओं, पशु-पक्षियों, यक्ष-यक्षिणियों और दैनिक जीवन के दृश्यों को अधिक विस्तार से मूर्तियों में प्रस्तुत किया।



भरहुत की मूर्तिकला

भरहुत स्तूप मौर्योत्तर कालीन कला का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसकी वेदिका और रेलिंगों पर अनेक शिल्प उकेरे गए थे। इन शिल्पों में बौद्ध धर्म से संबंधित जातक कथाओं, वृक्षों, पशु-पक्षियों, यक्ष-यक्षिणियों और धार्मिक प्रतीकों को अत्यंत रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया। प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध को प्रत्यक्ष मानव रूप में दिखाने के बजाय उनके स्थान पर बोधिवृक्ष, धर्मचक्र, खाली सिंहासन और पदचिह्न जैसे प्रतीकों का प्रयोग किया गया।




साँची की मूर्तिकला

साँची स्तूप मौर्योत्तर काल की मूर्तिकला और स्थापत्य का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र बना। इसके चारों दिशाओं में बने भव्य तोरणों पर बुद्ध के जीवन और जातक कथाओं से संबंधित अनेक दृश्य उकेरे गए हैं। हाथी, घोड़े, सिंह, यक्षिणियाँ, वृक्ष, राजकीय जुलूस और सामान्य जीवन के दृश्य इन शिल्पों को जीवंत बनाते हैं। साँची की मूर्तिकला से उस समय की वेशभूषा, आभूषण, सामाजिक जीवन और धार्मिक विश्वासों की भी जानकारी मिलती है।



अमरावती कला

दक्षिण भारत में मौर्योत्तर काल के दौरान अमरावती कला का विकास हुआ। अमरावती के शिल्पों में बौद्ध विषयों के साथ-साथ मानव आकृतियों को अत्यंत गतिशील और सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया। यहाँ की मूर्तियों में शरीर की लचक, भाव-भंगिमा और कथात्मक दृश्यों को विशेष महत्व दिया गया। अमरावती की कला ने आगे चलकर दक्षिण भारत की बौद्ध मूर्तिकला को गहरा प्रभाव प्रदान किया।



गांधार और मथुरा कला

मौर्योत्तर काल के अंतिम चरणों में गांधार और मथुरा दो अत्यंत महत्वपूर्ण मूर्तिकला केंद्र बनकर उभरे। गांधार कला में भारतीय विषयों के साथ यूनानी-रोमन कलात्मक प्रभाव दिखाई देता है। बुद्ध की मानव रूप में बनाई गई प्रतिमाएँ गांधार कला की प्रमुख पहचान बनीं। दूसरी ओर, मथुरा कला ने भारतीय परंपरा में बुद्ध, जैन तीर्थंकरों तथा विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को विकसित किया।


मानवीय आकृतियाँ


मानवीय आकृतियाँ
मानवीय आकृतियाँ


मौर्यकाल की मानवीय आकृतियों का प्रदर्शन करने वाली अनेक पत्थर की कलाकृतियाँ भी पायी गयी हैं। उनमें एक है- चौरी महिला की संरक्षित प्रतिमूर्ति जो पटना संग्रहालय में रखी हुई है।यह मूर्ति दीदारगंज के निवासियों को मिली थी। उसमें प्रयोग की गयी पालिश और रख-रखाव की तकनीक निसंदेह रूप से मौर्य काल की है।इस मूर्ति के शरीर के निचले हिस्से में वस्त्र हैं। इसके अतिरिक्त उस महिला ने कानों, बाहों और गले में बड़ी मात्रा में आभूषण पहने हुए हैं।

 इस प्रतिमूर्ति को भारतीय कला जगत के विकास की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाता है। इसी के साथ, चिपके निचले वस्त्र, वस्त्रहीन धड़ एवं प्रचूर आभूषण आम हो गये।

शुंग-सातवाहन युग



शुंग-सातवाहन युग
शुंग-सातवाहन युग


मौर्यों के बाद उत्तर भारत में (184 ईसा पूर्व) मुख्यत: सत्ता में शुंग रहे। सातवाहनों के पास दक्षिण पश्चिम क्षेत्र था। इस युग को प्रारंभिक कला के रूप में कला के इतिहास का दौरा कहा जाता है। शुंग-सातवाहन युग की कला का प्रभाव उत्तर भारत के बोधगया, सांची और भरहुत में बौद्ध आश्रमों के प्रवेश द्वार और रेलिंग में स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है, फिर भी कला के विकास का यह प्रारंभिक दौर सौदर्यपूर्ण आंदोलन का युग रहा जो कुषाण के शासन काल में कला के विकास के महानतम युग में प्रविष्ट हुआ।

कुषाण काल

कुषाण साम्राज्य में निर्मित मूर्तियाँ मूर्तिकला का अद्भुत उदहारण है। साम्राज्यवाद का कुषाण युग, इतिहास का एक महानतम आंदोलन रहा है, यह उत्तर पूर्वी भारत तथा पश्चिमी पाकिस्तान, (वर्तमान अफ़ग़ानिस्तान) तक फैला था। ईसवीं की पहली शताब्दी से तीसरी शताब्दी के बीच कुषाण एक राजनीतिक सत्ता के रूप में विकसित हुए और उन्होंने इस दौरान अपने राज्य में कला का बहुमुखी विकास किया।

गांधार मूर्तिकला शैली


गांधार मूर्तिकला



गांधार मूर्तिकला भारतीय मूर्तिकला के इतिहास की एक विशिष्ट शैली है, जिसमें भारतीय बौद्ध धार्मिक परंपरा और यूनानी-रोमन कला-परंपरा का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। गांधार क्षेत्र वर्तमान पाकिस्तान और अफगानिस्तान के कुछ भागों में फैला हुआ था। कुषाण काल में इस क्षेत्र में बौद्ध कला का विशेष विकास हुआ और बुद्ध की मानव रूप में अत्यंत प्रभावशाली प्रतिमाएँ बनाई जाने लगीं।

गांधार शैली की सबसे उत्कृष्ट उपलब्धियों में ध्यानमग्न बुद्ध की प्रतिमाएँ मानी जाती हैं। इन मूर्तियों में बुद्ध को एक शांत और योगी के रूप में बैठे हुए दिखाया गया है। उनके शरीर पर संन्यासी के वस्त्र दिखाई देते हैं और चेहरे पर गहरी आध्यात्मिक शांति तथा गंभीरता का भाव रहता है। उनकी बड़ी और शांत आँखें, उष्णीष अर्थात सिर पर बना उभार तथा ललाट की विशेष आकृति बुद्ध की आध्यात्मिक शक्ति और ज्ञान का प्रतीक मानी जाती है। इस प्रकार कलाकारों ने केवल बुद्ध की बाहरी आकृति ही नहीं, बल्कि उनके ध्यान, शांति, ज्ञान और आध्यात्मिक व्यक्तित्व को भी पत्थर में अभिव्यक्त करने का प्रयास किया।

मथुरा शैली


मथुरा शैली
मथुरा शैली


ईसा काल की प्रथम तीन शताब्दियाँ मथुरा शैली मूर्तिकला का स्वर्णिक काल हैं। महायान बौद्ध धर्म के नये आदर्शों ने तत्कालीन मूर्ति शिल्पकारों को प्रेरित किया था।यह शैली जैनों ग्रीकों एवं रोमनों की शैलियों से भी प्रभावित थी। जैन शैली द्वारा प्रभावित एक स्तूप की रेलिंग में चित्रित एक आकर्षक महिला की आकृतिया जो अत्यधिक आभूषणों से यिक्त है, 

प्राचीन भारतीय कला की यादगार और उल्लेखनीय कलाकृति सन्न्यास और धर्मपरायणता के सन्दर्भ में मठ की की इन मूर्तियों में कहीं भी अश्लीलता और कामोत्तेंना की भावभंगिमा नहीं दिखायी देती है।

भारतीय कला के इतिहास, मथुरा की कुषाण कला में इसलिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उसने प्रतीकवाद और मूर्ति शिल्पवाद को अपनाया और बाद में उसे स्वीकार कर लिया।

गुप्तकालीन मूर्तिकला

भारतीय कला के इतिहास में गुप्त काल को इसलिए महान युग कहा जाता है- क्योंकि कलाकृतियों की संपूर्णता और परिपक्वता जैसी चीज़ें इससे पहले कभी नहीं रहीं। इस युग की कलाकृतियों मूर्तिशिल्प, शैली एवं संपूर्णता, सुंदरता एवं संतुलन जैसे अन्य कला तत्वों से सुसज्जित हुई।

गुप्त धर्म से ब्राह्मण थे और उनकी भक्ति विशेष रूप से विष्णु में थी, किंतु उन्होंने बौद्ध धर्म और जैन धर्म के लिए भी उदारता दिखायी। पौराणिक हिंदू धर्म में तीन देवता हैं विष्णु, शिव एवं शक्ति।

 शिव के प्रति उनमें विशेष अनुराग था यानी शिव अग्रणी देवता थे। यद्यपि दक्षिण और पूर्व में शैववाद का विकास हुआ तथा दक्षिण-पश्चिम मालाबार के कुछ भागों में एवं पूर्वी भारत में शक्तिवाद का विकास हुआ कृष्ण पर आधारित वैष्णववाद था जो मुख्यत: भारत के उत्तरी एवं मध्यम भाग में केंद्रित रहा।

 इन सभी धार्मिक देवताओं की पूजा सब जगह होती रही और उनके मन्दिर एवं उनकी मूर्तियाँ सब जगह प्रतिष्ठापित हुई। गुप्त कला अध्यात्मिक गुणों से युक्त है और उसकी दृष्टि भी जीवन की गहन सच्चाई को दर्शाती है। यद्यपि गुप्तकाल का प्रारंभिक दौर हिंदू कला पर ज़ोर देता है, जबकि बाद का युग बौद्ध कला का शिखर युग है,

मूर्तियाँ


गुप्त मूर्ति कला की सफलता प्रारंभिक मध्यकाल की प्रतीकात्मक छवि एवं कुषाण युग की कलापूर्ण छवि के मध्य निर्मित एक संतुलन पर आधारित हैं। हिंदू, बौद्ध एवं जैन कलाकृतियाँ मध्य भारत सहित देश के अनेक भागों में पायीं। ये मूर्तिकला में अद्वितीय हैं। बेसनगर से गंगा की मूर्ति, ग्वालियर से उड़ती हुई अपस्राओं की मूर्ति सोंडानी से मिली हवा में लहराते गंधर्व युगल की मूर्ति, खोह से प्राप्त एकमुख लिंग और भुमारा से अन्य कई प्रकार की मिली मूर्तियाँ उसी सुंदरता, परिकल्पना और संतुलन को प्रदर्शित करती हैं। जैसा कि सारनाथ में देखा जाता है।
भगवान हरिहर की मानवाकार प्रतिमा मध्य प्रदेश में मिली है। 

वाराणसी से प्राप्त एक मूर्ति में उन्हें कृष्ण गोवर्धनधारी के रूप में अंकित किया गया है। जिसमें उन्हें बाएं हाथ के सहारे गोवर्धन पर्वत उठाए दिखाया गया है। जिसके नीचे वृंदावनवासी जल प्रलय से बचने के लिए एकत्रित हुए थे। वह भयावह जलवृष्टि इंद्र ने भेजी थी, जो वृंदावन वासियों की अपने प्रति उपेक्षा से क्रोधित हो उठे थे।

बुद्ध की प्रतिमाएं

गुप्तकालीन मूर्तिशिल्प में बुद्ध धर्म का शांति आदर्श अत्यंत भव्यता से बुद्ध की मूर्तियों में अभिव्यक्त हुआ है। उनके चहरे की भाव मुद्रा और मुस्कान उस परम समरसता की अनुभूति को दर्शाती है, जिसे उस महाज्ञानी ने प्राप्त किया था। कायिक स्थिति, हस्त मुद्राएं और अन्य सभी लक्षण प्रवृति-प्रतीकों के रूप में उपस्थित हैंमस्तक अंडाकार भौंहे कमान जैसी, पलकें कमल की पंखुड़ियां, सांची के विशाल स्तूप के प्रवेश द्वारों पर पांचवी सदी में रखी गयी बुद्ध की चार प्रतिमाएं उस कोमलता, लालित्य और प्रशांति को दर्शाती हैं,,बुद्ध की प्रतिमाएं मथुरा में भी मिली हैं, जो बौद्ध धर्म का सुसम्पन्न केन्द्र रहा था।

इस काल में बौद्ध मूर्तिशिल्प का एक अन्य सक्रिय केन्द्र सारनाथ था, जहाँ बुद्ध की खड़ी और बैठी प्रतिमाएं बनाई गई। ।हल्के रंग के बुलई पत्थर से बनी इस प्रतिमा में बुद्ध को बैठकर अपना प्रथम उपदेश देते हुए दर्शाया गया है।
 प्रतिमा की पीठिका के नीचे घुटनों के बल झुके हुए दो भिक्षुक को न्यायचक्र की पूजा करते दिखाया गया है।
 इस न्याय चक्र को बुद्धि का प्रतीक मानते हैं। यद्यपि भित्तिचित्र अजंता की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कलाकृतियां हैं, पर गुहा मन्दिर का स्थापत्य शिल्प और प्रवेश द्वारों पर नक़्क़ाशी भी असाधरण है

पाल मूर्तिकला शैली


पाल शैली की विशेषता इसकी मूर्तियों में परिलक्षित अंतिम परिष्कार है। बिहार और बंगाल के पाल और सेन शासकों के समय में  बौद्ध और हिंदू दोनों ने ही सुंदर मूर्तियाँ बनाई। इस मूर्तियों के लिए काले बैसाल्ट पत्थरों का प्रयोग किया गया है। मूर्तियां अतिसज्जित और अच्छी पॉलिश की हुई हैं- मानो वे पत्थर की न होकर धातु की बनी हों।

होयसल मूर्तिकला शैली


होयसल शैली (1050-1300ई) का विकास कर्नाटक के दक्षिण क्षेत्र में हुआ। ऐसा कहा जा सकता है कि होयसल कला आरंभ ऐहोल, बादामी और पट्टदकल के प्रारंभिक चालुक्य कालीन मंदिरों में हुआ अपनी प्रसिद्धि के चरमकाल में इस शैली की एक प्रमुख विशेषता स्थापत्य की योजना और सामान्य व्यवस्थापन से जुड़ी है।
होयसल मंदिर वास्तविक वास्तुयोजना के हिसाब से होयसल मंदिर केशव मन्दिर और हलेबिड के मन्दिर सोमनाथपुर और अन्य दूसरों से भिन्न हैं। स्तम्भ वाले कक्ष सहित अंतर्गृह के स्थान पर इसमें बीचो बीच स्थित स्तंभ वाले कक्ष के चारों तरफ बने अनेक मंदिर हैं, जो तारे की शक्ल में बने हैं।


कई मंदिरों में दोहरी संरचना पायी जाती है। इसके प्रमुख अंग दोहैं और नियोजन में प्राय: तीन चार और यहाँ तक कि पांच भी हैं। हर गर्भगृह के ऊपर बने शिखर को जैसे-जैसे ऊपर बढ़ाया गया है, उसमें आड़ी रेखाओं और सज्जा से नयापन लाया गया हैं, जो शिखर को कई स्तरों में बांटते हैं और यह धारे-धीरे कम घेरे वाला होता जाता है।वस्तुत: होयसल मंदिर की एक विशिष्टता संपूर्ण भवन की सापेक्ष लघुता है




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