भारत में मूर्तिकला और वास्तुकला का आरंभ कब से माना जाता है ?
भारत में मूर्तिकला और वास्तुकला की परंपरा अत्यंत प्राचीन मानी जाती है। भारतीय कला एवं स्थापत्य का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। इसके प्रारंभिक प्रमाण प्रागैतिहासिक काल से प्राप्त होते हैं, जबकि सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 2600–1900 ईसा पूर्व) में मूर्तिकला, भवन निर्माण और नगर नियोजन का विकसित एवं व्यवस्थित स्वरूप स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
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| भारत में मूर्तिकला और वास्तुकला का आरंभ कब से माना जाता है ? |
अन्य कलाओं की तरह भारतीय मूर्तिकला की परंपरा भी अत्यंत प्राचीन है। पाषाण काल में मानव अपने पत्थर के उपकरणों को काट-छाँटकर विभिन्न आकार देता था। पत्थर से फलक निकालने और उपकरणों को उपयोगी रूप देने के लिए दबाव तकनीक तथा प्रहार द्वारा तोड़ने जैसी तकनीकों का प्रयोग किया जाता था। हालांकि इन उपकरणों को आधुनिक अर्थों में मूर्तिकला नहीं कहा जा सकता, लेकिन इससे यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन मानव को पत्थर को आकार देने का पर्याप्त ज्ञान था।
भारत में मूर्तिकला का अधिक विकसित और स्पष्ट स्वरूप हड़प्पा या सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान दिखाई देता है। इस सभ्यता के विभिन्न पुरातात्विक स्थलों से प्राप्त मूर्तियाँ, टेराकोटा आकृतियाँ, पशु प्रतिमाएँ और मुहरें लगभग चार हजार वर्ष से अधिक पुरानी कला-परंपरा का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। मोहनजोदड़ो से प्राप्त प्रसिद्ध कांस्य नर्तकी की प्रतिमा प्राचीन भारतीय धातु-कला का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसी प्रकार पत्थर की मानव एवं पशु आकृतियाँ भी उस समय के कलाकारों की तकनीकी दक्षता को दर्शाती हैं।
भारत में मूर्तिकला का विकास
सिंधु घाटी सभ्यता के बाद भारतीय मूर्तिकला का विकास विभिन्न ऐतिहासिक कालों में निरंतर होता रहा। मौर्य काल (लगभग 322–185 ईसा पूर्व) में पत्थर पर उत्कृष्ट कार्य और विशाल पाषाण स्तंभों का निर्माण हुआ। सम्राट अशोक के स्तंभों पर उत्कीर्ण सिंह, बैल और अन्य आकृतियाँ भारतीय शिल्पकला की उच्च गुणवत्ता को दर्शाती हैं।
मौर्य काल के बाद शुंग, सातवाहन, कुषाण और अन्य कालों में भारतीय आकृतिमूलक मूर्तिकला का और अधिक विकास हुआ। इस दौरान बौद्ध, हिंदू और बाद में जैन धार्मिक परंपराओं से संबंधित मूर्तियों का निर्माण व्यापक रूप से होने लगा। मानव आकृतियों के माध्यम से धार्मिक विचारों, आध्यात्मिक अवधारणाओं और देवी-देवताओं के विभिन्न स्वरूपों को अभिव्यक्त किया गया।
भारतीय मूर्तिकला में मानव शरीर को केवल भौतिक रूप में नहीं, बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक प्रतीकों के रूप में भी प्रस्तुत किया गया। विशेष रूप से हिंदू मूर्तिकला में देवी-देवताओं के अनेक सिर और भुजाएँ उनकी विभिन्न शक्तियों, गुणों और स्वरूपों को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाती हैं।
भारत में वास्तुकला का आरंभ
भारत में वास्तुकला के प्रारंभिक व्यवस्थित प्रमाण भी सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त होते हैं। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा और लोथल जैसे नगरों में योजनाबद्ध सड़कें, मकान, कुएँ, जल निकासी प्रणाली तथा सार्वजनिक संरचनाएँ बनाई गई थीं।
मोहनजोदड़ो का प्रसिद्ध महान स्नानागार (Great Bath) प्राचीन भारतीय वास्तुकला और जल प्रबंधन का महत्वपूर्ण उदाहरण है। वहीं धोलावीरा में विकसित जल-संग्रहण प्रणाली और नगर नियोजन उस समय की उन्नत स्थापत्य एवं इंजीनियरिंग समझ को प्रदर्शित करते हैं।
इसके बाद मौर्य काल में स्तूप, स्तंभ, राजकीय भवन तथा शैल-कट वास्तुकला का विकास हुआ। आगे चलकर बौद्ध चैत्य-विहार, हिंदू मंदिर तथा जैन स्थापत्य ने भारतीय वास्तुकला को अलग-अलग क्षेत्रीय और धार्मिक शैलियों में विकसित किया।
भारतीय मूर्तिकला और वास्तुकला की विशेषता
भारतीय मूर्तिकला और वास्तुकला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि दोनों का विकास धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन के साथ गहराई से जुड़ा रहा। मंदिरों, स्तूपों और गुफाओं में वास्तुकला के साथ-साथ मूर्तिकला और अलंकरण का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।
समय के साथ भारत में मौर्य, शुंग, सातवाहन, कुषाण, गुप्त, पल्लव, चालुक्य, चोल, राष्ट्रकूट और विजयनगर जैसी विभिन्न राजवंशीय एवं क्षेत्रीय परंपराओं ने कला और स्थापत्य को समृद्ध किया। परिणामस्वरूप भारत में मंदिर वास्तुकला, शैल-कट गुफाओं, स्तूपों, स्तंभों तथा विभिन्न प्रकार की मूर्तिकला की अनेक विशिष्ट शैलियाँ विकसित हुईं।
👉 सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तिकला
👉 मौर्यकालीन मूर्तिकला
👉 मौर्योत्तर कालीन मूर्तिकला
👉 गांधार कला की मूर्तियाँ
👉 मथुरा कला की मूर्तियाँ
👉 अमरावती की मूर्तिकला
👉 गुप्तकालीन मूर्तिकला
👉 वाकाटककालीन मूर्तिकला
👉 मध्यकालीन भारतीय मूर्तिकला
👉 चोलकालीन मूर्तिकला
👉 आधुनिक भारतीय मूर्तिकला
👉 भारतीय वास्तुकला एवं मूर्तिकला का संबंध
प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय वास्तुकला की एक अद्भुत विशेषता यह है कि मूर्तिकला और स्थापत्य कला एक-दूसरे के अभिन्न अंग रहे हैं। भारत के अनेक प्राचीन मंदिरों, स्तूपों, गुफाओं और अन्य स्थापत्य संरचनाओं में वास्तुशिल्प के साथ-साथ उत्कृष्ट मूर्तिकला और अलंकरण देखने को मिलता है।
इस संदर्भ में सिंधु घाटी सभ्यता की वास्तुकला कुछ अलग दिखाई देती है। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और अन्य नगरों में भवन निर्माण मुख्यतः उपयोगिता, नगर नियोजन, जल प्रबंधन और सुव्यवस्थित निर्माण पर केंद्रित था। इन संरचनाओं में बाद के भारतीय मंदिरों की तरह व्यापक सजावटी मूर्तिकला दिखाई नहीं देती। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि सिंधु घाटी सभ्यता में कलात्मक कौशल का अभाव था। इस सभ्यता से प्राप्त कांस्य नर्तकी, पत्थर की मानव एवं पशु आकृतियाँ, टेराकोटा मूर्तियाँ और कलात्मक मुहरें उस समय की विकसित कला-कौशल का प्रमाण हैं।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि सिंधु घाटी सभ्यता की वास्तुकला अपेक्षाकृत उपयोगितावादी थी, जबकि उसकी मूर्तिकला और शिल्पकला अन्य माध्यमों में विकसित हुई। बाद के कालों में भारतीय वास्तुकला और मूर्तिकला का संबंध और अधिक घनिष्ठ होता गया तथा मंदिरों, स्तूपों और गुफा स्थापत्य में दोनों कलाओं का अद्भुत समन्वय दिखाई देने लगा।
सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तिकला
सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तिकला भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीन कला-परंपरा का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। लगभग 2600–1900 ईसा पूर्व के परिपक्व हड़प्पा काल में शिल्पकारों ने पत्थर, कांस्य, तांबा, मिट्टी और टेराकोटा जैसी विभिन्न सामग्रियों का प्रयोग करके मानव तथा पशु आकृतियों का निर्माण किया। इन कलाकृतियों से तत्कालीन समाज की कलात्मक क्षमता, तकनीकी ज्ञान और सांस्कृतिक जीवन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
पुरातात्विक साक्ष्यों से पता चलता है कि सिंधु घाटी सभ्यता का परिपक्व शहरी चरण अत्यंत विकसित था। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा और अन्य नगरों में योजनाबद्ध सड़कें, पक्की ईंटों से बने मकान, जल निकासी की सुव्यवस्थित व्यवस्था, सार्वजनिक भवन, भंडारण संरचनाएँ और विभिन्न प्रकार की कार्यशालाएँ मिली हैं। इन नगरों के वैज्ञानिक नियोजन और उन्नत निर्माण तकनीक से स्पष्ट होता है कि उस समय का समाज आर्थिक एवं तकनीकी दृष्टि से काफी विकसित था। ऐसे समृद्ध समाज में कला और शिल्प का विकसित होना स्वाभाविक था।
सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त मूर्तियों में मानव और पशु आकृतियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनमें से कुछ पत्थर की मूर्तियाँ अत्यंत उच्च स्तर की शिल्पकला को प्रदर्शित करती हैं। मोहनजोदड़ो से प्राप्त लगभग 7 इंच ऊँची एक दाढ़ी वाले पुरुष की सिर और कंधे तक की प्रतिमा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसके चेहरे पर छोटी दाढ़ी, बारीकी से बनाई गई मूंछें तथा शांत भाव दिखाई देते हैं। इसे आधुनिक साहित्य में प्रायः “पुरोहित-राजा” (Priest-King) कहा जाता है, हालांकि इसे वास्तव में राजा या पुरोहित मानने का कोई निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
इस प्रतिमा की शैली में चेहरे की प्रस्तुति और कुछ अन्य विशेषताओं के कारण पश्चिम एशिया, विशेषकर मेसोपोटामिया की कुछ प्राचीन कलाकृतियों से तुलना की गई है। इससे सिंधु घाटी सभ्यता और समकालीन पश्चिम एशियाई संस्कृतियों के बीच संभावित सांस्कृतिक एवं व्यापारिक संपर्कों की ओर संकेत मिलता है। हालांकि किसी प्रत्यक्ष सांस्कृतिक प्रभाव का निश्चित निष्कर्ष निकालना अभी भी कठिन है।
मौर्यकालीन मूर्तिकला
हड़प्पा युग और मौर्य काल के बीच के लंबे अंतराल से संबंधित अनेक पुरातात्विक अवशेष आज हमारे सामने उपलब्ध नहीं हैं। इसका एक प्रमुख कारण यह माना जाता है कि उस समय भवनों और अन्य संरचनाओं के निर्माण में पत्थर की अपेक्षा लकड़ी, कच्ची ईंट और अन्य नष्ट होने वाली सामग्रियों का अधिक प्रयोग किया जाता था। इसके विपरीत, मौर्य काल में पत्थर के व्यापक प्रयोग और उस पर उत्कृष्ट पॉलिश की तकनीक के कारण इस युग के अनेक महत्वपूर्ण अवशेष आज भी सुरक्षित हैं।
मौर्य शासन और विशेष रूप से पाटलिपुत्र की भव्यता का उल्लेख यूनानी राजदूत मेगास्थनीज ने अपनी पुस्तक इण्डिका में किया है। उसके विवरण के अनुसार पाटलिपुत्र एक विशाल और सुदृढ़ नगर था, जो मजबूत लकड़ी की प्राचीर से घिरा हुआ था। नगर में अनेक बुर्ज और प्रवेश द्वार थे तथा इसके भीतर राजमहल स्थित था। मेगास्थनीज ने राजमहल की भव्यता की तुलना फारसी शाही भवनों से की थी। पाटलिपुत्र की यह स्थापत्य परंपरा मौर्यकालीन शहरी विकास और राजकीय वैभव को दर्शाती है।
सम्राट अशोक के शासनकाल में मौर्य कला को विशेष प्रोत्साहन मिला। बौद्ध धर्म अपनाने के बाद अशोक ने स्तूपों, स्तंभों, शिलालेखों और धार्मिक स्मारकों के निर्माण को बढ़ावा दिया। उनके द्वारा स्थापित पत्थर के स्तंभ और उनके शीर्ष पर बनी सिंह, बैल तथा हाथी जैसी पशु आकृतियाँ मौर्यकालीन मूर्तिकला की उत्कृष्ट उपलब्धियाँ हैं। अशोक के समय पत्थर पर की गई चमकदार पॉलिश और शिल्प-कौशल ने भारतीय कला को एक नई दिशा प्रदान की।
एक महत्वपूर्ण तथ्य: फ़ाह्यान भारत लगभग 399–414 ईस्वी के बीच आया था, न कि 1400 ईस्वी के आसपास। उसने पाटलिपुत्र में अशोक के महल से संबंधित अवशेषों का उल्लेख किया था। इससे यह संकेत मिलता है कि मौर्यकालीन स्थापत्य की भव्यता सदियों बाद भी यात्रियों के लिए आकर्षण का विषय बनी हुई थी।
मौर्योत्तर कालीन मूर्तिकला
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारतीय कला और मूर्तिकला में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी-चौथी शताब्दी ईस्वी तक विभिन्न क्षेत्रों में शुंग, सातवाहन, शक, कुषाण आदि राजवंशों के संरक्षण में मूर्तिकला का तेजी से विकास हुआ। मौर्यकाल की राजकीय और भव्य कला के आगे बढ़ते हुए इस दौर में कलाकारों ने धार्मिक कथाओं, मानव आकृतियों, देवी-देवताओं, पशु-पक्षियों, यक्ष-यक्षिणियों और दैनिक जीवन के दृश्यों को अधिक विस्तार से मूर्तियों में प्रस्तुत किया।
भरहुत की मूर्तिकला
भरहुत स्तूप मौर्योत्तर कालीन कला का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसकी वेदिका और रेलिंगों पर अनेक शिल्प उकेरे गए थे। इन शिल्पों में बौद्ध धर्म से संबंधित जातक कथाओं, वृक्षों, पशु-पक्षियों, यक्ष-यक्षिणियों और धार्मिक प्रतीकों को अत्यंत रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया। प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध को प्रत्यक्ष मानव रूप में दिखाने के बजाय उनके स्थान पर बोधिवृक्ष, धर्मचक्र, खाली सिंहासन और पदचिह्न जैसे प्रतीकों का प्रयोग किया गया।
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साँची की मूर्तिकला
साँची स्तूप मौर्योत्तर काल की मूर्तिकला और स्थापत्य का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र बना। इसके चारों दिशाओं में बने भव्य तोरणों पर बुद्ध के जीवन और जातक कथाओं से संबंधित अनेक दृश्य उकेरे गए हैं। हाथी, घोड़े, सिंह, यक्षिणियाँ, वृक्ष, राजकीय जुलूस और सामान्य जीवन के दृश्य इन शिल्पों को जीवंत बनाते हैं। साँची की मूर्तिकला से उस समय की वेशभूषा, आभूषण, सामाजिक जीवन और धार्मिक विश्वासों की भी जानकारी मिलती है।
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अमरावती कला
दक्षिण भारत में मौर्योत्तर काल के दौरान अमरावती कला का विकास हुआ। अमरावती के शिल्पों में बौद्ध विषयों के साथ-साथ मानव आकृतियों को अत्यंत गतिशील और सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया। यहाँ की मूर्तियों में शरीर की लचक, भाव-भंगिमा और कथात्मक दृश्यों को विशेष महत्व दिया गया। अमरावती की कला ने आगे चलकर दक्षिण भारत की बौद्ध मूर्तिकला को गहरा प्रभाव प्रदान किया।
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गांधार और मथुरा कला
मौर्योत्तर काल के अंतिम चरणों में गांधार और मथुरा दो अत्यंत महत्वपूर्ण मूर्तिकला केंद्र बनकर उभरे। गांधार कला में भारतीय विषयों के साथ यूनानी-रोमन कलात्मक प्रभाव दिखाई देता है। बुद्ध की मानव रूप में बनाई गई प्रतिमाएँ गांधार कला की प्रमुख पहचान बनीं। दूसरी ओर, मथुरा कला ने भारतीय परंपरा में बुद्ध, जैन तीर्थंकरों तथा विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को विकसित किया।
मानवीय आकृतियाँ
शुंग-सातवाहन युग
कुषाण काल
गांधार मूर्तिकला शैली
गांधार मूर्तिकला भारतीय मूर्तिकला के इतिहास की एक विशिष्ट शैली है, जिसमें भारतीय बौद्ध धार्मिक परंपरा और यूनानी-रोमन कला-परंपरा का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। गांधार क्षेत्र वर्तमान पाकिस्तान और अफगानिस्तान के कुछ भागों में फैला हुआ था। कुषाण काल में इस क्षेत्र में बौद्ध कला का विशेष विकास हुआ और बुद्ध की मानव रूप में अत्यंत प्रभावशाली प्रतिमाएँ बनाई जाने लगीं।
गांधार शैली की सबसे उत्कृष्ट उपलब्धियों में ध्यानमग्न बुद्ध की प्रतिमाएँ मानी जाती हैं। इन मूर्तियों में बुद्ध को एक शांत और योगी के रूप में बैठे हुए दिखाया गया है। उनके शरीर पर संन्यासी के वस्त्र दिखाई देते हैं और चेहरे पर गहरी आध्यात्मिक शांति तथा गंभीरता का भाव रहता है। उनकी बड़ी और शांत आँखें, उष्णीष अर्थात सिर पर बना उभार तथा ललाट की विशेष आकृति बुद्ध की आध्यात्मिक शक्ति और ज्ञान का प्रतीक मानी जाती है। इस प्रकार कलाकारों ने केवल बुद्ध की बाहरी आकृति ही नहीं, बल्कि उनके ध्यान, शांति, ज्ञान और आध्यात्मिक व्यक्तित्व को भी पत्थर में अभिव्यक्त करने का प्रयास किया।
मथुरा शैली
गुप्तकालीन मूर्तिकला
मूर्तियाँ
बुद्ध की प्रतिमाएं
पाल मूर्तिकला शैली
होयसल मूर्तिकला शैली
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